मिलावटी पेट्रोल बेचने का कॉर्पोरेट खेल
एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी उपभोक्ताओं को किस तरह लूट रही है, समझने के लिए किसी सूक्ष्मता की जरूरत नहीं
मोदी सरकार ने यह दावा किया था कि शुद्ध पेट्रोल से एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल सस्ता होगा। लेकिन यह दावा भी दूसरे वादों की तरह जुमला ही साबित हुआ है, क्योंकि ई-10 और इसके बाद ई-20 उसी कीमत पर बेचा जा रहा है, जिस कीमत पर शुद्ध पेट्रोल बेचा जाता था, जबकि इससे माइलेज कम मिलता है और गाड़ियों में ज्यादा टूट-फूट होती है।
सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को हाल ही में एक पत्र लिखकर एथेनॉल-मिश्रित ईंधन से होने वाले नुकसान पर चिंता जताई है, जिसमें पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट करने के जोखिमों और दुष्परिणामों को रेखांकित किया गया। हालांकि, बाद में सरकार के दबाव में आकर उस पत्र को वापस ले लिया गया, लेकिन इससे उसमें उठाई गई बातों की तर्कसंगतता खत्म नहीं हो जाती।
एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी साफतौर पर उपभोक्ताओं को किस तरह लूट रही है, उसे समझने के लिए किसी सूक्ष्मता की जरूरत नहीं है। इस समय देश में सरकारी पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल की कीमत औसतन 105 रुपये प्रति लीटर है। अब इसमें माइलेज में 10 प्रतिशत गिरावट को जोड़ें। यदि एक दुपहिया एक लीटर शुद्ध पेट्रोल में 60 किमी. चलता है, तो मिलावटी पेट्रोल से 54 किमी. ही चलेगा और गाड़ी को 60 किमी. चलाने के लिए 115 रुपये का पेट्रोल खरीदना पड़ेगा।
इस गणना में मिलावटी पेट्रोल से गाड़ियों में हो रही टूट-फूट की मरम्मत का खर्च शामिल नहीं है। लेकिन मामला केवल यहीं तक सीमित नहीं है, क्योंकि इससे खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा प्रश्न खड़ा होता है। एथेनॉल का उत्पादन मुख्यत: मक्का और गन्ना से होता है। एक ऐसे देश में, जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी और कुपोषण से जूझ रहा है, वहां खाद्य फसलों का इस्तेमाल ईंधन के उत्पादन के लिए किया जाना गंभीर सवाल खड़े करता है।
मोदी सरकार की इस नीति के खिलाफ संघर्ष छेड़ने की जरूरत है। उपभोक्ता को चयन का अधिकार मिलना चाहिए कि वह किस प्रकार का पेट्रोल खरीदना चाहता है — शुद्ध पेट्रोल या मिलावटी पेट्रोल। इसके साथ ही, एथेनॉल मिश्रित ईंधन की कीमत शुद्ध पेट्रोल से आनुपातिक रूप से कम होनी चाहिए, ताकि कम माइलेज और टूट-फूट के कारण गाड़ियों की मरम्मत का भार उपभोक्ताओं पर न पड़े।